कर्मकाण्ड

कालसर्प योग

कालसर्प एक ऐसा योग है जो जातक के पूर्व जन्म के किसी जघन्य अपराध के दंड या शाप के फलस्वरूप उसकी जन्मकुंडली में परिलक्षित होता है। व्यावहारिक रूप से पीड़ित व्यक्ति आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान तो होता ही है, मुख्य रूप से उसे संतान संबंधी कष्ट होता है। या तो उसे संतान होती ही नहीं, या होती है तो वह बहुत ही दुर्बल व रोगी होती है। उसकी रोजी-रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है। धनाढय घर में पैदा होने के बावजूद किसी न किसी वजह से उसे अप्रत्याशित रूप से आर्थिक क्षति होती रहती है। तरह तरह के रोग भी उसे परेशान किये रहते हैं।

शत चण्डी

The Shat Chandi paath and Homa is an exclusive and powerful ritual involving powerful Saptashati mantras. Sat Chandi Yajna and Homa is a very unique, rare and elaborate Yajna. Getting the Sat Chandi Yajna and Homa done is an act of great merit and brings immense blessings from the Divine Mother. It bestows immense energy. As a result, even the greatest hardships that may seem hopeless to an individual may be conquered and at the same time immense blessings from the Divine Mother can be brought in. It frees from debts and prevents from all kind of misfortunes and agonies. The paath grants the disciple with success, authority and power. The paath and yagna kills all the demons and evil forces coming in life. It enhances spirituality and awakens the slept energy and opens the path of salvation. The paath with samputit invokes powerful vibrations to destroy obstacles and conquer enemies.


ज्योतिष क्या है ?



आकाश की ओर दृष्टि डालते ही मस्तिष्क में उत्कण्ठा उत्पन्न होती है कि ये ग्रह नक्षत्र क्या वस्तु है़ ? तारें क्यों टुटकर गिरतें है ? सूर्य प्रतिदिन पूर्व दिशा में ही क्यों उदित होता है ? ऋतुऐं क्रमानुसार क्यों आती है आदि।
मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वह जानना चाहता है - क्यों ? कैसे ? क्या हो रहा है ? और क्या होगा ? यह केवल प्रत्यक्ष बातों को ही जानकर संतुष्ट नही होता, बल्कि जिन बातों से प्रत्यक्ष लाभ होने की संभवना नही है, उनाके जानने के लिए भी उत्सुक रहता है। जिस बात को जानने की मानव को उत्कट इच्छा रहती है, उसके अवगत हो जाने पर उसे जो आनंद मिलता है, जो तृप्ति होती है उससे वह निहाल हो जाता है।
ज्योतिष शास्त्र की व्युत्पति- ज्योतिषं सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्रम् अर्थात् सूर्यादि ग्रहों के विषय में ज्ञान कराने वाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहते है। इसमें प्रधानतः ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु आदि ज्योतिः पदार्थो का स्वरूप, संचार, परिभ्रमण काल, ग्रहण और स्थिति, प्रभृति, समस्त घटनाओं का निरूपण एवं ग्रह नक्षत्र की गति, स्थिति और संचारानुसार शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है। मनीषियों का अभिमत है कि आकाश मण्डल में स्थित ज्योति संबंधी विविध विषयक विद्या को ज्योतिर्विद्या कहते है। ज्योतिष शास्त्र में गणित और फलित दोनों प्रकार के विज्ञानों का समन्वय है। आधुनिक समय में इस शास्त्र को 5 रूपों में बांटकर अध्ययन किया जा रहा है।
ज्योतिष शास्त्र के प्रर्वतक- संपूर्ण ज्योतिष शस्त्र को वेदो का नेत्र कहा गया है। भारतीय संस्कृति की आत्मा को समझने के लिए वेदों का अध्ययन मनन और चिन्तन परम आवश्यक है। जिस पदार्थ का ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण या अनुमान, प्रमाण से नही होता है। उसकी प्रतीति वेदों के आधार पर होती है। यही वेदों का वेदत्व या प्रकाशकत्व कहा जाता है। सनातन संस्कृति का आधार आचार है। आचार या आचरण ही संस्कृति व धर्म का मूल है। तथा समसत आचार यज्ञ प्रधान होने से काल ज्ञान पर निर्भर है। व्यवहार में दैनिक कियाकलापांे का सूयोंदय, सूर्यास्त, दिनरात, तिथि, मास, पक्षादि के बिना संपन्न नहीं हो सकते है। इनके विश्ष्टि काल संपादन के लिये ज्योतिष शास्त्र आवश्यक है। ऋषियों, मनीषीयों, आचार्यो ने अपनी ऋतंभरा प्रज्ञा से इसे समय-समय पर परिष्कृत व शंशोधित किया है। ज्योतिष शास्त्र के 18 महर्षि प्रर्वतक या संस्थापक के रूप् में जाने जाते है। काश्यप् के मतानुसार इनके नाम क्रमशः सूर्य, पितामह, व्यास, वशिष्ट, अत्रि, पाराशर, काश्यप, नारद, गर्ग, मरीचि, मनु, अंगिरा, लोमश, पौलिश, च्यवन, यवन, भृगु एंव शौनक है।
ज्योतिष शास्त्र के तीन स्कंध होते है।
प्रथम स्कंध ‘‘सिद्धान्त‘‘ - जिसमें त्रुटि से लेकर प्रलय काल तक की गणना, सौर, सावन, नाक्षत्रादि, मासादि, काल मानव का प्रभेद, ग्रह संचार का विस्तार तथा गणित क्रिया की उपपति आदि द्वारा ग्रहों, नक्षत्रों, पृथ्वी की स्थिति का वर्णन किया गया है। इस स्कंद के प्रमुख ग्रंथ ग्रह लाघव, मकरन्द, ज्योर्तिगणित, सूर्य सिद्धान्तादि प्रसिद्ध है।
द्वितीय स्कंध ‘‘संहिता‘‘ - इस स्कन्द में गणित को छोड़कर अंतरिक्ष, ग्रह, नक्षत्र, ब्रह्माण्ड आदि की गति, स्थिति एंव ततत् लोकों में रहने वाले प्राणियों की क्रिया विशष द्वारा समस्त लोकों का समष्टिगत फलों का वर्णन है। उसे संहिता कहते है। वाराह मिहिर की वृहत् संहिता, भद्र बाहु संहिता इस स्कन्द की प्रसिद्ध ग्रंथ है।
तृतीय स्कंध ‘‘होरा‘‘ - होरा इस स्कन्द में जातक, जातिक, मुहूर्त प्रश्नादि का विचार कर व्यष्टि परक या व्यक्तिगत फलादेश का वर्णन है। इस स्कन्द के प्रसिद्ध ग्रंथ वृहत् जातक, वृहत् पाराशर होरशास्त्र, सारावली, जातक पारिजात, फलदीपिका, उतरकालामृत, लघुपाराशरी, जैमिनी सूत्र और प्रश्नमार्गादि प्रमुख ग्रंथ है।
दैवज्ञ किसे कहते हैं - ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता को ‘‘दैवज्ञ‘‘ के नाम से भी जाना जाता है। दैवज्ञ दो शब्दों से मिलकर बना है। दैव $ अज्ञ। दैव का अर्थ होता है। भाग्य और अज्ञ का अर्थ होता है जानने वाला। अर्थात् भाग्य को जानने वाले को दैवज्ञ कहते है। वाराह मिहिर ने वाराह संहिता में दैवज्ञ के निम्नलिखित गुण बताये है। जिसके अनुसार एक दैवज्ञ का आंतरिक व बाह्य व्यक्तित्व सर्वर्था उदात, महनीय, दर्शनीय व अनुकरणीय होना चाहिये। शांत, विद्या विनय से संपन्न, शास्त्र के प्रति समर्पित, परोपकारी, जितेन्द्रीय, वचन पालक, सत्यवादी, सत्चरित्र, आस्तिक व पर निन्दा विमुख होना चाहिये। वास्तविक दैवज्ञ को ज्योतिष के तीनों स्कनधों का ज्ञान होना आवश्यक है।
ज्योतिष की उत्पत्ति का काल निर्धारण आज तक कोई नही कर सका। क्योंकि ज्योतिष को वेदका नेत्र माना जाता है और वेद की प्राचीनता सर्व मान्य है। संसार का सबसे प्रचीन ग्रंथ वेद माने जाते हैं और वेद के छः अंग है।

1. शिक्षा

2. कल्प
3. व्याकरण
4. निरूक्त
5. छनद
6. ज्योतिष
मान्यताओं के अनुसार वेद ही सब विद्याओं का उद्गम है। अतः यह स्पष्ट है कि ज्योतिष की उत्पत्ति उतनी ही प्रचीन है जितनी वेदों की।

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